Sunday, February 20, 2011

“बेटा सेब नहीं apple” !!!


आजकल के ‘मॉडर्न’ ज़माने में माँ-बाप भी दो प्रकार के होने लगे हैं- एक जो अपने बच्चों को लंका में राम की जीत की कहानियाँ सुनाते हैं, हनुमान और वानर सेना के बारे में बताते हैं और दूसरे जो सेब को apple या आम को mango कहना सिखाते हैं!

अंग्रेज़ी भाषा एक भूत की तरह लोगों पर सवार होती जा रही है! मानो इंग्लिश बोलना ज़रूरत से ज़्यादा स्टेटस सिंबल हो! यहाँ तक की माँ-बाप के लिए इंग्लिश बोलता बच्चा सोसाईटी में एक अलग ही जगह मिल जाने के समान है!

ऐसे ही एक परिवार से मुलाकात हो गई मेरी इस बार दिल्ली से मुंबई आते समय ऐयरपोर्ट पर! अब जब प्लेन 6 घंटे लेट हो, तो आप आस-पास बैठे लोगों को देखने के अलावा कर भी क्या सकते हैं! जीन्स-टॉप में माँ और पिता को देख बिल्कुल अजीब नहीं लगा, न ही उन्हे देख इस बात का अनुमान लगाने में टाइम लगा की यह भी उन माँ-बाप में से ही हैं जो आम-आदमी केटेगरी में नहीं, mango-people की केटेगरी में आते हैं और जल्द ही मेरी यह बात ठीक साबित हुई!

बेटे ने जैसे ही पास में Tissot की दुकान को देख ज़ोर से कहा, “मम्मा, घड़ी..!,” माँ-बाप की तो जैसे जान ही निकल गयी! भाग के माँ ने बेटे को गोद में उठाते हुए बोला, “बेटा those are called watches,” और फिर मेरी तरफ इशारा करते हुए बोली, “see what दीदी is doing on her laptop.” दिल में बस एक ही ख़याल आया, “शुक्र है, दीदी बोला, elder sister नहीं!”

ऐयरपोर्ट पर पास बैठे इस परिवार से जान-पहचान हो गयी! माँ ने बड़े ही गर्व के साथ बताया की बेटा जी. डी. गोइनका में पढ़ रहा है! नर्सरी में पढ़ता बच्चा, ‘A’ फॉर ‘Apple’ से ज़्यादा V फॉर ‘Versace’ जानता है! उसे देश के प्रधानमंत्री का नाम नहीं पता, पर हान, एम.एम.एस का फुल-फॉर्म ठीक आता है!

जी. डी. गोइनका में पढ़ाने का कारण पूछा तो सुनने को मिला की वर्ल्ड-क्लास स्कूल में पढ़ेगा तब ही आगे बढ़ेगा, दुनिया के तौर-तरीके सीखेगा! एक बार को मन में आया भी कि बोल दूं, ऐसे स्कूल में पढ़ाने का क्या फ़ाएदा जो बच्चों को अपने देश के बारे में कम और ब्रेंड्स के बारे में ज़्यादा सिखाए पर फिर किसी तरह ख़ुद को रोक लिया!

मैं वर्ल्ड-क्लास स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने या अंग्रेज़ी सीखने-सिखाने के खिलाफ नहीं हूँ! मैं तो ख़ुद उनमे से हूँ जो इंग्लिश में सोच कर हिन्दी में लिखते हैं! दुख यह देख के हुआ की बच्चे को टोक-टोक के माँ-बाप इंग्लिश सिखा रहे हैं! अब अगर बच्चा सेब को केला बोले तो भी समझ आता है, पर अगर बच्चा सेब को सेब ही बोल रहा है तो क्या समस्या है? फिर क्यों बोलना होता है, “बेटा सेब नहीं apple”??

ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेरे माँ-बाप ने मुझे इंग्लिश के लिए कभी टोका हो! हान, टोकते थे तो ग़लत बोलने पर! किसी भी भाषा में बात करने पर कोई रोक नहीं थी, पर कोई भाषा ग़लत बोली जाए तो उसे ज़रूर ठीक किया जाता था और व्याकरण पर तो ख़ासा ध्यान दिया जाता था! शायद इसलिये आज जहाँ मैं अच्छी इंग्लिश बोल लेती हूँ, वहीं मेरी हिन्दी भी ठीक-ठाक है!

खैर, इस बारे में सोचते-सोचते मुझे मेरे चचेरे भाई की बेटी के एड्मिशन का किस्सा याद आ गया! मेरी भतीजी को एक स्कूल में एड्मिशन इसलिये नहीं मिला क्योंकि जब उसे रंग पहचानने को कहा गया तो उसने ग्रीन को हरा बोल दिया! सुनकर ऐसा ही लगता है जैसे स्कूल एड्मिशन न देने का बहाना बना रहा हो! रंग न जानने पर एड्मिशन न होता तो भी एक बार को समझ आता!

अब आप ही बताइए ऐसी हालत में माँ-बाप करें भी तो क्या करें? अब अगर माँ-बाप इंग्लिश के पीछे हाथ धो कर पड़ भी रहे हों तो उनका क्या दोष? हमारे देश का हाल ही कुछ ऐसा हो गया है! इंग्लिश का पागलपन इतना बढ़ गया है की माँ-बाप भी मॉम-डेड बन गये हैं!

स्कूल के एड्मिशन से लेकर नौकरी ढूंढने तक, इंग्लिश का बुखार सर चढ़ा हुआ है! अंग्रेज़ी आती हो तो समझ लो की आप का मूल्य बढ़ गया है और न आती हो तो सीख लो! पागलपन इस प्रकार का है की आज हर गली-नुक्कड़ पर इंग्लिश कोचिंग मिल जाती है! आप सीखने वाले बनो, सिखाने वाले हजारों हैं!

उसके ऊपर, थोक के भाव में कॉल-सेंटर्स के खुलने से इस पीढ़ी का सारा ध्यान इंग्लिश से ज़्यादा इंग्लिश बोलने के दिखावे पर है! व्याकरण चाहें बिल्कुल ग़लत हो, कोशिश यही रहती है कि उच्चारण अमरिकी हो! तभी तो, “he do, I does,” प्रकार के वाक्य सुनने को मिल जाते हैं, लेकिन उच्चारण बिलकुल सही!

लिखते-लिखते नानी की एक बात याद आ गयी, जब भी हम उन्हे इंग्लिश सिखाने की कोशिश करते, वो यही कहती थीं, "अंग्रेज़ चले गये, अंग्रेज़ी छोड़ गये!"

Sunday, February 13, 2011

स्टोरी कहाँ है?

आजकल हर गली-नुकड पर या तो मुन्नी के बदनाम होने के चर्चे हैं, या शीला के जवान होने की खबर! किसी पर "पैसा-पैसा" करने का इल्ज़ाम है तो कोई भैंस पर बैठ के बाबूजी को धीरे चलने की सलाह देती है! आलम यह है की आजकल मुन्नाभाई भी एम.बी.बी.एस. होने लगे हैं और देश को गाँधीगिरी सिखाते दिखते हैं! ऐसा ही कुछ हाल है हमारी फिल्म इंडस्ट्री या आम बोलचाल मे हमारे बॉलीवुड की फिल्मों का!

बात सिर्फ़ गानो तक सीमित होती तो ध्यान देना आसान होता, पर जब पूरी की पूरी फिल्म ही ऐसी हो तो क्या करेंगे आप और मैं? हाल--बयान कुछ इस प्रकार है की आज जब सिनेमा मे दर्शक फिल्म देखने जाता है तो जहाँ जेब मे 1000 के दो नोट होना ज़रूरी है, वहीं अपना दिमाग़ घर छोड़कर जाना भी ज़रूरी होता है!

आजकल फिल्मों मे स्टोरी ना होना एक फॅशन सा हो गया है! बस फिल्म का नाम अच्छा होना चाहिए, स्टोरी होने होने से कोई फरक नही पड़ता! गौर करने वाली बात तो यह है की यह फिल्में हमेशा ही बड़े बजेट पर बनाई जाने वाली फिल्मों मे से होती हैं!

और ऐसी फिल्मों मे काम करने वाले अभिनेताओं की भी कोई मी नही है! इनमे देखा जाए तो सबसे पहला नाम अक्षय कुमार का ही सूझता है! एक के बाद एक फ्लॉप फिल्में देने वाले अक्षय जहाँ किसी फिल्म मे किंग (सिंग इस किंग) कहलाते हैं वहीं किसी फिल्म मे ७०स का लुक (ऐक्षन रिप्ले) देते नज़र आते हैं! इन फिल्मों मे अक्षय के अलावा समानता बस यही है की इनमे ही कोई स्टोरी है और ही अच्छे अभिनय का प्रदर्शन!

अभिनेत्रियों मे कटरीना केफ ने भी कुछ कम कमाल नही दिखाया है! अक्षय के साथ ही एक के बाद एक सेन्स्लेस फिल्म करने का अवॉर्ड उन्हे ही जाता है! दीपिका पादुकोंन भी ज़्यादा पीछे नही है! आख़िर अक्षय के साथ उन्होने भी ऐसी ही कई फिल्मों मे काम किया है!

अब सलमान
ख़ान कीदबंग” को ही देखलो! मुन्नी की बदनामी से मशहूर हुई यह फिल्म तो इस कदर चली की सारे अवॉर्ड्स घर ले गयी! नाज़ाने लोगों को इस पिक्चर मे क्या नज़र आया! बेल्ट हिलाता, "दबंग दबंग" करता सलमान इस दर लोगों को पसंद जाएगा, मैने सोचा ना था! किसी से इस विषय पर चर्चा करी तो सुनने को मिला की एकशन देखने लायक था! शायद एक भ्रष्ट पुलीस इनस्पेक्टर को रजनीकांत की तरह गुण्डों को धोता देखना ही लोगों को भा गया!

दबंग तो फिर भी ठीक है लेकिन उन्न कुछ फिल्मों का क्या जो हर शुक्रवार को इस उमीद पर बड़े पर्दे पे उतरती हैं की इस बार तो कुछ लोग सिनेमा हॉल मे नज़र आएँगे! नो प्रॉबलम, हाउस्फुल, अंजाना-अंजानी, सब फिल्मों मे हाल वही, गाने कई, स्टोरी नही!

हाल ही मे आईतीस मार ख़ानकी तो पूछिए ही मत! फराह ख़ान ने तो मानो बदला ही निकालो हो दर्शकों से! दर्शकों को हसाने के चक्कर मे यह ख़याल भी नही रहा की मज़ाक किस बात पर, किस चीज़ का बन रहा है! हसने का मौका कब मिला फिल्म मे, मुझे पता ही नही लगा! हान, रोने के कई मौके थे.. जब भी याद आता की 400 का एक टिकेट खरीद के इससे देख रही हूँ, रोना ही आया!

ऐसा नही है की मेरे पास पैसा बहुत है और काम बिल्कुल नही! पर इस क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने देश की नागरिक होते हुए अगर मैने भी २-४ फिल्में देख ली तो क्या ग़लत किया?
फिल्में लिखने, निर्देश करने और बनाने वालों से बस एक ही गुज़ारिश है, कृपया फिल्में ऐसी बनाए की हास्ये को देख हसी आए,रोना नही! ना ही हॉल मे अंदर बैठ के टिकेट की कीमत के बारे मे सोच सोच कर रोना निकले! महँगाई के चलते, टिकेट की कीमत ज़्यादा होना बड़ी बात नही है, पर दुख तब होता है जब अपनी मेहनत की कमाई ऐसी फिल्मों पर खर्च हो जाती है जिनमे ना स्टोरी होती है ना अभिनय!

ऐसा भी नही है की अच्छी फिल्मों की लोगों को कद्र नही है! बेंड बाजा बारात अच्छी फिल्म कही जा सकती है! रियलिस्टिक पात्रों को दर्शाते हुए, एक साधारण सी फिल्म, जिसे देख अगर वाह-वाही नही भी निकलती तो दुख भी नही होता की समय और पैसा दोनो बर्बाद हुए!

आप नही मानते तो बताइए पीपलि लाइव की लोकप्रियता को कैसे समझाएँगे! न बड़े अभिनेता-अभिनेत्री न ज़्यादा बजेट, बस एक अच्छी स्टोरी और अच्छा अभिनय, अच्छे डाइलॉग और बस एक अच्छी फिल्म!

मैं रियलिटी सिनिमा का प्रचार करने वालों मे से नही हूँ, ना ही मुझे आर्ट फिल्में समझ आती हैं! हान, लेकिन अच्छी फिल्म देखना मेरा भी हक़ बनता है और फिल्म बनाने वालों की ज़िम्मेदारी!