आजकल हर गली-नुकड पर या तो मुन्नी के बदनाम होने के चर्चे हैं, या शीला के जवान होने की खबर! किसी पर "पैसा-पैसा" करने का इल्ज़ाम है तो कोई भैंस पर बैठ के बाबूजी को धीरे चलने की सलाह देती है! आलम यह है की आजकल मुन्नाभाई भी एम.बी.बी.एस. होने लगे हैं और देश को गाँधीगिरी सिखाते दिखते हैं! ऐसा ही कुछ हाल है हमारी फिल्म इंडस्ट्री या आम बोलचाल मे हमारे बॉलीवुड की फिल्मों का!
बात सिर्फ़ गानो तक सीमित होती तो ध्यान न देना आसान होता, पर जब पूरी की पूरी फिल्म ही ऐसी हो तो क्या करेंगे आप और मैं? हाल-ए-बयान कुछ इस प्रकार है की आज जब सिनेमा मे दर्शक फिल्म देखने जाता है तो जहाँ जेब मे 1000 के दो नोट होना ज़रूरी है, वहीं अपना दिमाग़ घर छोड़कर जाना भी ज़रूरी होता है!
आजकल फिल्मों मे स्टोरी ना होना एक फॅशन सा हो गया है! बस फिल्म का नाम अच्छा होना चाहिए, स्टोरी होने न होने से कोई फरक नही पड़ता! गौर करने वाली बात तो यह है की यह फिल्में हमेशा ही बड़े बजेट पर बनाई जाने वाली फिल्मों मे से होती हैं!
और ऐसी फिल्मों मे काम करने वाले अभिनेताओं की भी कोई कमी नही है! इनमे देखा जाए तो सबसे पहला नाम अक्षय कुमार का ही सूझता है! एक के बाद एक फ्लॉप फिल्में देने वाले अक्षय जहाँ किसी फिल्म मे किंग (सिंग इस किंग) कहलाते हैं वहीं किसी फिल्म मे ७०स का लुक (ऐक्षन रिप्ले) देते नज़र आते हैं! इन फिल्मों मे अक्षय के अलावा समानता बस यही है की इनमे न ही कोई स्टोरी है और न ही अच्छे अभिनय का प्रदर्शन!
अब सलमान ख़ान की “दबंग” को ही देखलो! मुन्नी की बदनामी से मशहूर हुई यह फिल्म तो इस कदर चली की सारे अवॉर्ड्स घर ले गयी! नाज़ाने लोगों को इस पिक्चर मे क्या नज़र आया! बेल्ट हिलाता, "दबंग दबंग" करता सलमान इस कदर लोगों को पसंद आ जाएगा, मैने सोचा ना था! किसी से इस विषय पर चर्चा करी तो सुनने को मिला की एकशन देखने लायक था! शायद एक भ्रष्ट पुलीस इनस्पेक्टर को रजनीकांत की तरह गुण्डों को धोता देखना ही लोगों को भा गया!
दबंग तो फिर भी ठीक है लेकिन उन्न कुछ फिल्मों का क्या जो हर शुक्रवार को इस उमीद पर बड़े पर्दे पे उतरती हैं की इस बार तो कुछ लोग सिनेमा हॉल मे नज़र आएँगे! नो प्रॉबलम, हाउस्फुल, अंजाना-अंजानी, सब फिल्मों मे हाल वही, गाने कई, स्टोरी नही!
हाल ही मे आई “तीस मार ख़ान” की तो पूछिए ही मत! फराह ख़ान ने तो मानो बदला ही निकालो हो दर्शकों से! दर्शकों को हसाने के चक्कर मे यह ख़याल भी नही रहा की मज़ाक किस बात पर, किस चीज़ का बन रहा है! हसने का मौका कब मिला फिल्म मे, मुझे पता ही नही लगा! हान, रोने के कई मौके थे.. जब भी याद आता की 400 का एक टिकेट खरीद के इससे देख रही हूँ, रोना ही आया!
ऐसा नही है की मेरे पास पैसा बहुत है और काम बिल्कुल नही! पर इस क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने देश की नागरिक होते हुए अगर मैने भी २-४ फिल्में देख ली तो क्या ग़लत किया?
फिल्में लिखने, निर्देश करने और बनाने वालों से बस एक ही गुज़ारिश है, कृपया फिल्में ऐसी बनाए की हास्ये को देख हसी आए,रोना नही! ना ही हॉल मे अंदर बैठ के टिकेट की कीमत के बारे मे सोच सोच कर रोना निकले! महँगाई के चलते, टिकेट की कीमत ज़्यादा होना बड़ी बात नही है, पर दुख तब होता है जब अपनी मेहनत की कमाई ऐसी फिल्मों पर खर्च हो जाती है जिनमे ना स्टोरी होती है ना अभिनय!
ऐसा भी नही है की अच्छी फिल्मों की लोगों को कद्र नही है! बेंड बाजा बारात अच्छी फिल्म कही जा सकती है! रियलिस्टिक पात्रों को दर्शाते हुए, एक साधारण सी फिल्म, जिसे देख अगर वाह-वाही नही भी निकलती तो दुख भी नही होता की समय और पैसा दोनो बर्बाद हुए!
ऐसा भी नही है की अच्छी फिल्मों की लोगों को कद्र नही है! बेंड बाजा बारात अच्छी फिल्म कही जा सकती है! रियलिस्टिक पात्रों को दर्शाते हुए, एक साधारण सी फिल्म, जिसे देख अगर वाह-वाही नही भी निकलती तो दुख भी नही होता की समय और पैसा दोनो बर्बाद हुए!
आप नही मानते तो बताइए पीपलि लाइव की लोकप्रियता को कैसे समझाएँगे! न बड़े अभिनेता-अभिनेत्री न ज़्यादा बजेट, बस एक अच्छी स्टोरी और अच्छा अभिनय, अच्छे डाइलॉग और बस एक अच्छी फिल्म!
मैं रियलिटी सिनिमा का प्रचार करने वालों मे से नही हूँ, ना ही मुझे आर्ट फिल्में समझ आती हैं! हान, लेकिन अच्छी फिल्म देखना मेरा भी हक़ बनता है और फिल्म बनाने वालों की ज़िम्मेदारी!
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